अनंगरंग वह कृति है जिसने अपनी विषय-वस्तु (content) के कारण कामसूत्र को भी दूसरे स्थान पर खड़ा कर दिया। जहाँ वात्स्यायन ने केवल चार प्रकार की स्त्रियों (पद्मिनी, चित्रिणी, शंखिनी, हस्तिनी) का वर्णन किया है, वहीं कल्याणमल्ल सैंतीस (37) प्रकार की स्त्रियों का विस्तृत विवरण देते हैं। उनके साथ के अनुभवों का वर्णन इस कृति को अत्यंत घटनापूर्ण और रोमांचक बनाता है।
इसके अतिरिक्त, स्त्री शरीर विज्ञान, दृश्य और गुप्त अंगों का विस्तृत वर्गीकरण, स्त्री मनोविज्ञान, उनके गुण-दोष, आकर्षण, वश और वशीकरण जैसे विषयों का वर्णन अद्वितीय है। इसका ‘चित्तविधायक’ नामक मनोवैज्ञानिक अध्याय आधुनिक मनोविज्ञान के विशेषज्ञों को भी चकित कर देता है। अनंगरंग सिद्धांतों और विरोधाभासों का एक अद्भुत भंडार है।
कामसूत्र सुरक्षित हाथों में पहुँचने के कारण विश्व भर में प्रसिद्ध हुआ, लेकिन अनंगरंग को औपनिवेशिक शासन (Colonial rule) के हस्तक्षेप के कारण दबा दिया गया। विक्टोरियन शासन इससे भयभीत था। कहा जाता है कि आकर्षण, वश और वशीकरण जैसे अध्याय इसका मुख्य कारण थे। बाद के समय में अनुवाद के रूप में कुछ संस्करण सामने तो आए, लेकिन वे सभी पूरी तरह से अधूरे थे।
कल्याणमल्ल ‘अनंगरंग’ के रचयिता, एक महान विद्वान, यात्री, कवि और बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उनका जन्म वर्तमान आंध्र प्रदेश के कलिंग देश के कर्पूर राजवंश में त्रैलोक्यचंद्रमल्ल के पौत्र और गजमल्ल के पुत्र के रूप में हुआ था। वह एक उत्साही यात्री थे। अपने विशेष व्यक्तित्व के कारण वह हर जगह स्वीकार्य थे। यद्यपि उन्होंने कई अन्य कृतियाँ भी रची हैं, लेकिन ‘अनंगरंग’ को उनकी उत्कृष्ट कृति (Masterpiece) माना जाता है।
कल्याणमल्ल ने ‘अनंगरंग’ की रचना जौनपुर के (उप) सुल्तान लाद लोदी के मानसिक आनंद के लिए की थी, जिनके वे शुभचिंतक और गुरु समान थे। वल्लभरायर की कृति ‘कल्याणमल्लचरितम’ संकेत देती है कि कल्याणमल्ल का मुख्य उद्देश्य सुल्तान लाद लोदी को उनके सौतेले भाई और दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी (शासनकाल 1517-1526) के साथ संघर्ष से बचाना था। वह उन्हें युद्ध के खतरे से हटाकर सुख और ज्ञान की खोज की ओर मोड़कर उनका जीवन सुरक्षित करना चाहते थे।
सौ से अधिक शारीरिक रचना (Anatomical) चित्रों के साथ ‘Archive Scrolls’ द्वारा प्रकाशित ये दो पुस्तकें अब हिंदी में ई-बुक के रूप में उपलब्ध हैं।
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प्रकाशक की टिप्पणी
आमुख
वंदना श्लोक
भूमिका
कल्याणमल्ल राजसभा में
यात्रा आरंभ
प्रथम स्थल
चंद्रकला विवरण
पद्मिनी • चित्रिणी • शंखिनी • हस्तिनी
प्राचीन नारियों में चंद्रकला
पद्मिनी लक्षण • चित्रिणी लक्षण • शंखिनी लक्षण • हस्तिनी लक्षण
उनकी सुखतिथियाँ
अभिप्राय
कामदेव के संचार स्थल
स्त्रियों का संतोष समय
द्वितीय स्थल
सैंतीस जाति स्त्रियाँ (चित्रों सहित)
पद्मिनी • चित्रिणी • शंखिनी • हस्तिनी • मृगिणी • विशाला • कर्कटा • दुंदुभी • श्येनी • वज्रा • असंध्या • वात्याया • माधवी • पिंगला • तित्तिरी • मंदारा • मयूरी • मातंगिनी • हंसिनी • कपिला • शरभा • त्सषम् • चंचला • मेदसिनी • चातकी • भ्रमरी • पटला • करभा • खरिणी • वलिता • वृक्षवती • सर्पिणी • भद्रा।
विशेषमोहिनियाँ
तिलोत्तमा • विचित्रा • ऋतुशोभिनी • चतुरा।
द्विजाग्रसिद्धांत
मधुरूपिणी और मृणालिनी
हंसराजपुरसत्र
स्त्रियों के बारह मनोविधायक
छिन्नमस्ता • छत्रिणी • कपिला • दीप्तशिला • चारिणी, विषया • विलासिनी • वधु, कुटिला • वेतालिनी • राक्षसी • पिशाचिनी।
तृतीय स्थल
अंगभेद
अधरभेद
सामान्याधर: पाटल • कर्णिका • संगम • विचित्र • वर्द्धमान • सौरभ • शुक • नील।
भावाधर: दीनाधर • रम्योष्ठ • कुपितोष्ठ • स्वतवक्रोध
अधरपान का विशद और शास्त्र
स्तनाध्याय (स्तनों पर अध्याय)
विविध जाति स्तन (चित्रों सहित)
मुकुल • शर्मीयानी • बालाम्बुज • पार्श्वकन्या, संयुक्ता • अधोगोलक • भद्रा • शक्ति • कुंभ • उद्घट • कर्कट • विश्रांता • लंबिनी • सर्पिणी।
स्तनास्वादन
ओष्ठम • रगडन • आस्य • दंश • लेहन • चोषण।
शुचि • मृगी • वडवा • सुगंधिका • वत्कलोष्ठ • गुरुशिश्निका • पत्रपंक्तिका • अद्रिकर्णिका • चंपका • चित्री • पिनद्धपूर्णा • स्वामिनी • मार्जारी • नीविका।
नितंबाध्याय
बारह प्रकार के नितंब (चित्रों सहित)
शिलालता • गोल • काकद्म • वृत्क • लंबक • यष्टिक • आयत।
नितंबोद्देश्य
स्कंधाकार (कंधों के आकार) (चित्रों सहित)
सिंहासिनी • मृदंगिनी • चित्रामिनी • विकर्णिनी • धनुरिणी • अश्विनी।
ऊरु आकार (जांघें) (चित्रों सहित)
कन्याचर्म
कन्याचर्म बारह प्रकार (चित्रों सहित)
प्रीति चार प्रकार
नैसर्गिकी प्रीति • विषय-प्रीति • सम-प्रीति • अभ्यासिकी प्रीति
योनिस्वरूप
रताभिलाष लक्षण
विवाहाद्योद्देश्य
कन्यका लक्षण • कन्याभूषण • (3) जामातृ लक्षण • (4) जामातृ दोष
परस्त्रीगमन निषेध
अगम्या
दूत्यं
सुखसाध्य लक्षण
अनुरागिणी लक्षण
दुस्साध्य लक्षण
निंद्यस्थान
विहित प्रदेश
बाह्यसंभोगविधान
आठ परिवेष्टन: गूढ़ लक्षण • तिलतंडुल लक्षण
चुंबनभेद: चिळितं • स्फिरितं • पंडिताख्यं • तिर्यक • उत्तरोष्ठ • संज्ञक • वक्त्र, संपुट • प्रतिबोध • समोष्ठ। • केशग्रहणोद्देश्यम् • भुजंगवल्लिका • कामवर्तंसम् • पक्षिवत् • समहस्तकम् • रथाङ्गवज्रकम्
नखदानविधि
क्षुरित • अर्धचंद्र • मंडल • व्याघ्रनख • मयूरपाद • शर • उत्पलपत्र।
रदविधान (दांतों के निशान)
अष्टमहानायिका लक्षण
स्वेच्छागामिनी (अथवा स्वयंवरगामिनी)
वेश्याविश्लेषण
देशनियम
मध्यदेश की स्त्रियाँ • मालवदेश की स्त्रियाँ • आभीरदेश की स्त्रियाँ • लाटदेश की स्त्रियाँ • कर्नाटक • आंध्र • कोसल • पाटलिपुत्र • महाराष्ट्र वंग • गौड़ • उत्कल कामरूप • नववास • गुर्जर सिंधु • अवंति • बाल्हीक • तीरभुक्त पुष्पपुर • चेरितलिंग • मलय द्रविड़ • सौवीर • कांबोज • पौण्ड्र • पर्वत • गांधार • कश्मीर • म्लेच्छ।
वसुमती की कही कहानी
संयोगविलास
वदनभोग: लिंगवदनभोग • योनिपान।
सुरतभेद (Sex Positions) • 64 प्रकार (चित्रसहित)
शययित: समपाद • नागर • त्रैविक्रम • व्योमपद • सुरवज्र • दारक • सौम्य • कूर्परारूढ़ • जृंभित • सुरतभ्रमरिक • स्पंदप्रहरिक • पिष्टक • वेणुविदारित • भुग्नक • स्पुरित • अतिवीण।
तिर्यक:
संपुट • कर्कट • युग्मपाद • तिर्यक रोपन • कांचनिक • संलग्निक • कुंडलीभुजंग • स्कंधारोपि • पीठतिर्यारोहण।
उपविष्ट:
सापवद • अंगोपसंग • बंधुरित • फणपाश • आनंदयुग्म • संयमन • वज्रोपविष्ट • प्रसरोपविष्ट • लाक्षाकुंड।
उत्थित:
जानुखर्व • हरिविक्रम • कीर्तिबंध।
कुंचित:
धैनुक • ऐभ • पृष्ठपार्श्वक • अलसमार्जार • द्विशीर्ष • द्विशीर्षोत्थित • विपृष्ठासन • वातारूढ़ • अवगाहिनी • उष्ट्रायन • विहंगविहार • यक्षमैथुन।
पुरुषायित / विपरीत:
सामान्यविपरीत • विभ्रामर • विपरिपातन • प्रतिगामिनी • उरहारूढ़ • क्षेपयान • नौकाविहारिका • सामान्यविपर्यतिर्यक • प्रत्यालंबितविपर्य • ऊर्ध्वारूढ़ • अधोशीर्ष।
उल्कलिका
रतचलन अथवा लिंगविलास
सुरत का तत्व
संयोग में विरोधाभास
वदनसंयोग विरोधाभास
अंगुलीक्रियाएँ
त्रिकामसंधि
तांत्रिकरति
चित्रकूट में कवि और राजा
तांत्रिकरति का रहस्य
तांत्रिकरति प्रशिक्षण
आकर्षण तत्व
आकर्षण विरोधाभास
वश्य
वश्य के सामान्य तत्व
वश्य के सिद्धांत
वश्य के विरोधाभास
वशीकरणादिक
बहुसंगसमीक्षा
भावाध्याय
स्त्रियों के स्थायीभाव
स्त्रीभाषणाध्याय
कोकिलवाणी • मृदुनी • दुंदुभी • पिंगा • कुचिलवाणी • हंसवाणी • मंदवाणी • नूपुरा • मंत्रवाणी • शुष्कवाणी • सिंहवाणी • वज्रा • निर्जरा • कपोतवाणी।
मुखांग लक्षण
मुख • नयन • नासिका • भौंहें •कान • गर्दन।
मुखश्री
लावण्यगाढ़ता का शास्त्र
छायाविस्तृति
स्त्रियों के अंधेरे पहलू (तमोपार्श्व)
शशमृग्यादिभेद
शशस्वरूप • वृषलक्षण • अश्वलक्षण • मृगीलक्षण • बडवालक्षण • करिणीलक्षण।
द्रावणविधि
स्तंभन • पुरुषपौष्टक • लिंगस्थूलीकरण • योनि संकोचन • योनिसंस्कार • नष्टपुष्पसमुच्चयविधि • पुष्पाधिक्यनिवारण • गर्भाधानविधि • गर्भस्तंभनविधि • सुखप्रसवविधि • वंध्यात्वापादनविधि • केशश्वतीकरण • मुखकंटककरण • कुचसंस्कार।
कल्पी नामक भग्नभवन
निषेकनियोग अथवा कल्याणमल्ल के सर्वनारीवल्लभ बनने की कथा
दक्षिणवारिणीतट
मोहतीर (कल्याणमल्ल चरित के शृंगार कथन)
• अंतःपुर के भीतर का अंतःपुर • युद्ध-अश्वों की जननी रात की त्वचा पर चाँदनी • खड्गाभिसार • स्त्रैणसुंदरों को चाहने वाली • वीरकुंवारी का मृत्युपाश • पसीने से भीगी पुष्करिणी • मुरझाया पारिजात • स्वयं को खाने वाली आग • निशितशिला पर खिला पुष्प • मिथिलाप्रांत में फिर से • रेवम्मा का नया वेश • उत्तरद्राविड़ की नर्तकी • वणिक दूत और बंजारासुंदरी • वणिक की विधवा • रंगरानी • इतालवी गाँव में गुप्त ठिकाना • रेशम बुनकर • पाटलिपुत्र की संन्यासिनी • शब्दों की रानी • पत्थर की राजकुमारी • वनवास • प्रणयेच्छा के घाव • अष्टपालकविभ्रम •
जौनपुर वापसी
अंतिम उपदेश:
विदा